श्री वेद व्यास कृत श्रीमदभगवत गीता का हिंदी पद्य रूपांतरण

Genre :

Author : रूपांतरकार प्रो. लक्ष्मीनारायण गुप्त

Binding : Paperback

Publication Date : August 2020

299.00

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भारत की आध्यात्मिक पुस्तकों में गीता का विशेष स्थान है जैसाकि सर्वविदित है। अमेरिका आने पर लेखक ने पाया कि गीता के दर्जनों अंग्रेजी अनुवाद हैं जिनमें से कुछ काव्य में भी हैं। उन्हें लगा कि हिन्दी में गीता के पद्यानुवादों की बड़ी कमी है। यह अनुवाद इस कमी की पूर्ति का एक प्रयास है।

आधुनिक हिन्दी भाषियों में ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है जिन्हें संस्कृत का इतना ज्ञान हो कि मूल को समझ सकें। पद्यानुवाद से न केवल अर्थ समझने अपितु पंक्तियों को याद रखने में भी सुविधा होगी। बहुत से साधक गीता की पंक्तियों का प्रयोग ध्यान में करते हैं। आशा है उनके लिए भी यह अनुवाद विशेष उपयोगी होगा।

अनुवाद की भाषा जहाँ तक सम्भव हुआ है, सरल रखी गई है। गीता में प्रयुक्त संस्कृत शब्दों को, जो हिन्दी में भी आमतौर से प्रयुक्त होते हैं, वैसे ही ले लिया गया है। प्रयास किया गया है कि अनुवाद में गीताकार का ही अर्थ लोगों तक पहुँचाया जाए न कि अनुवादक का मत। आशा है कि भारतीय जन-साधारण इस अनुवाद को अपनाएगा क्योंकि यह उन्हीं के लिए लिखा गया है, विद्वानों के लिए नहीं।

रूपांतरकार प्रो. लक्ष्मीनारायण गुप्त

प्रो. लक्ष्मीनारायण गुप्त की प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा कानपुर में हुई। 1965 में क्राइस्टचर्च कॉलेज से गणित में एम.एस.सी. किया। एक वर्ष आई.आई.टी. कानपुर में बिताने के बाद 1966 में अमेरिका गए। न्यूयार्क के राजकीय विश्वविद्यालय के बफलो केन्द्र से 1962 में गणित में पी.एच.डी. की तथा 1980 से रॉचेस्टर इन्स्टीच्यूट ऑफ टेक्नॉलाजी में गणित के प्राध्यापक हैं।

डॉ० गुप्त की बचपन से ही साहित्य में रुचि थी। किशोरावस्था में कुछ कविताएं भी लिखी थी। 1991 में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की मुख पत्रिका के तत्कालीन प्रबंध संपादक श्री राम चौधरी के सम्पर्क में आने पर सृजनात्मक प्रवृत्तियाँ फिर जागी। तीन वर्ष के प्रयास के बाद गीता का अनुवाद 1996 में समाप्त हुआ। कुछ कविताएं विश्वा, विश्व-विवेक भाषा सेतु और हिन्दी-जगत में प्रकाशित हुई हैं। इलेक्ट्रॉनिक पत्रिकाओं जैसे अनुभूति, बोलोजी, कलायन, ई-कविता, हिन्दी-फोरम, आदि में भी काफी कविताएं प्रकाशित हुई है। बोलोजी पर ईशावास्योपनिषद् का अनुवाद भी उपलब्ध है। डॉ० गुप्त की कविताएं और निबन्ध उनके ब्लाग “”www.kavyakala.blogspot.com”” पर पढ़ी जा सकती हैं।

Binding

Paperback

PAGE COUNT

200

Lamination

Matt

ISBN

9789390266203

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